यह 5 समीकरण रहे कर्नाटक चुनाव मे बीजेपी की जीत के प्रमुख कारण

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नई दिल्ली. मौसम के उतार चढ़ाव के बाद आज  कर्नाटक चुनाव के रुझानों में भी उतार चढ़ाव देखने को मिला. रुझानों को देखते हुए लग रहा है की बीजेपी पूर्णबहुमत के साथ दक्षिण भारत में एक बार फिर से एंट्री कर रही है. चुनाव विशेषज्ञों की माने तो कर्नाटक का ये चुनाव साल 2019 में होने वाले लोकसभा चुनाव के लिहाज से काफी महत्वपूर्ण समझे जा रहे हैं.

यहाँ आपको बता दें की इस चुनाव में भी नरेंद्र मोदी की लहर बरकरार रही है. साथ ही साथ, भाजपा के चाणक्या माने जाने वाले अमित शाह की रणनीति भी पूरी तरह कारगर साबित होती दिख रही है.

जानिए क्या रहे बीजेपी की जीत के 5 महत्वपूर्ण कारण:

1 – अमित शाह की सोशल इंजीनियरिंग रही सटीक

भाजपा खेमे के चाणक्या माने जाने वाले बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह का भी चुनाव लड़ने का अपना ही अलग तरीका है. वह पन्ना प्रमुख से लेकर, बूथ, पोलिंग स्टेशन, वार्ड, विधानसभा, जिले और प्रत्याशी तक पर एकदम सटीक रणनीति बनाते हैं. साथ ही कर्नाटक में अपने 34 दिन के प्रवास के दौरान अमित शाह ने 57 हजार किमी की यात्रा की, जिसमे उन्होने पूरे 30 जिलो का खुद दौरा किया और ज़मीनी स्तर के कार्यकर्ताओं तक से सीधे बात कर संदेश दिया. यही नही, अमित शाह विभिन जातियों को साधने में भी कामयाब दिखे. उन्होंने सीट दर सीट जातीय समीकरण को ध्यान में रखकर प्रत्याशियों को उतारा और नतीजा सामने है.

 

2 – कर्नाटक चुनाव में दिखा हिंदुत्व का असर

अगर कर्नाटक चुनाव का पूरा आकलन करा जाए, तो कर्नाटक के पांचों रीजन में बीजेपी ने काफ़ी बेहतर प्रदर्शन किया है. यहाँ तक की तटीय इलाकों में भाजपा का हिंदुत्व कार्ड भी सही से चल गया है. यही नही, बीजेपी लिंगायतों के मुद्दे को हिंदुओं को बाँटने की राजनीति साबित करने मे भी कामयाब रही. हिंदू एकता ने यहाँ चुनावी समीकरण ही बदल दिया और रुझान देखकर साफ लगता है कि बीजेपी जनता को यह समझाने में सफल हो गई.

3 – नरेंद्र मोदी की लहर रही बरकरार:

इस बार के कर्नाटक चुनाव ने भी साफ कर दिया है कि साल 2014 से शुरू हुई नरेंद्र मोदी नाम की लहर अभी खत्म नहीं हुई है. यही नही, 10 दिन में नरेंद्र मोदी ने कर्नाटक राज्य के चुनाव की पूरी रूप-रेखा को बदल दिया है. नरेंद्र मोदी ने अपनी 21 चुनावी रैलियों में क्षेत्रिय से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक के जो मुद्दे उठाए, उससे कांग्रेस और जेडीएस दोनो ही बैकफुट पर दिखे. यहाँ तक की उन्होंने कांग्रेस और मुख्यमंत्री सिद्धारमैया पर जिस तरह से निशाना साधा, उसने पूरा समीकरण ही बदल कर रख दिया. सूत्रो के अनुसार, हालात यहां तक आ गए थे कि खुद सिद्धारमैया को कई बार कहना पड़ा कि ये चुनाव सिद्धारमैया बनाम नरेंद्र मोदी नहीं, बल्कि येदियुरप्पा है. लेकिन मोदी तो मोदी हैं. उन्होंने एक के बाद एक राजनीतिक मुद्दों से विपक्षियों को पूरी तरह धाराशाही कर दिया.

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4 – लिंगायत समाज ने बीजेपी पर जताया अपना भरोसा:

यहाँ आपको बता दें की कर्नाटक चुनाव से ठीक पहले सिद्धारमैया ने एक अलग तरह की राजनीति करते हुए वहाँ के हिंदू धर्म के लिंगायत समुदाय को अलग धर्म की मान्यता दे कर एक अलग तरह की रणनीति बनाई थी. राज्य की आबादी में सबसे मजबूती से दखल देने वाले लिंगायतों को साधने के लिए सिद्धारमैया की रणनीति पर बीजेपी ने उन्हे आड़े हाथ लिया और इसे हिंदुओं को बांटने की राजनीति बताया. दूसरी और लिंगायत समुदाय से आने वाले येदियुरप्पा बहुत शांति से चुनाव में लगे रहे. बीजेपी ने टिकट बंटवारे में बी लिंगायतों का खासा ध्यान दिया. ऐसे में रुझानों के बाद साफ दिखता है कि लिंगायतों ने बीजेपी पर पूरा भरोसा जताया है.

5 – दलित वोटबैंक साधने में रहे कामयाब:

विशेषज्ञों के मुताबिक, कर्नाटक में दलित वोटबैंक भी काफी अहम रहा. जिसका ताज़ा उदाहरण आप वोटिंग खत्म होने के अगले दिन सिद्धारमैया के उस बयान से भी देख सकते हैं, जिसमें उन्होंने सॉफ तौर पर कहा था कि दलित सीएम बनेगा. यही नही, बीजेपी ने भी दलितों को साधने की रणनीति बनाई. साथ ही साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एससी/एसटी एक्ट पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर विपक्ष द्वारा दिए गए तीखे बयानों की भी काफ़ी आलोचना की और दलितों को ये बात समझाने में कामयाब रहे कि भाजपा उनके साथ हर मोर्चे पर खड़ी है.

 

 

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